लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
लोकतंत्र की नींव पर प्रहार और मौन व्यवस्था: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, एसआईआर (SIR) का संकट और चुनाव आयोग की निष्पक्षता का ह्रासभारतीय गणतंत्र का संपूर्ण ताना-बाना जिस एक सबसे मजबूत और क्रांतिकारी स्तंभ पर टिका है, वह है—"सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise)"। यह अधिकार केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय लोकतंत्र की वह आत्मीय गारंटी है, जिसके तहत देश का हर वयस्क नागरिक—चाहे वह किसी भी आर्थिक तबके, पद, ओहदे, जाति, धर्म या लिंग से ताल्लुक रखता हो—समान राजनीतिक हैसियत का हकदार बनता है।
लेकिन वर्तमान प्रशासनिक परिदृश्य में, विशेषकर दिल्ली जैसे महानगर में चलाए जा रहे विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) और इसके उपरांत चुनाव आयोग द्वारा जारी विज्ञпतियों ने इस मूल संवैधानिक भावना को गहरा आघात पहुँचाया है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण है, बल्कि यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के सुनियोजित क्षरण की ओर इशारा करती है।
1. संवैधानिक और विधिक विश्लेषण: समानता बनाम 'वीआईपी' की श्रेणी
भारतीय संविधान के "अनुच्छेद 326" के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर कराए जाने का स्पष्ट प्रावधान किया गया है। इसका विधिक अर्थ यह है कि देश का प्रत्येक नागरिक जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है (जिसे 1988 के 61वें संविधान संशोधन द्वारा 21 से घटाकर 18 वर्ष किया गया था), वह बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकारी है।
संविधान की नजर में कोई भी व्यक्ति विशिष्ट या साधारण नहीं है। मतदान केंद्र की कतार में प्रधानमंत्री, उद्योगपति और एक आम दिहाड़ी मजदूर का वोट तकनीकी और कानूनी रूप से बिल्कुल समान मूल्य रखता है।
विज्ञप्ति का विरोधाभास: ऐसे में, दिल्ली चुनाव आयोग द्वारा हाल ही में जारी विज्ञप्ति में 'वीआईपी मतदाता' शब्द का प्रयोग किया जाना संविधान की मूल भावना के सीधे विपरीत है।
यह शब्दावली इस खतरनाक वैचारिक विचलन को जन्म देती है कि लोकतंत्र में कुछ नागरिक 'अधिक समान' (More Equal) हैं, जबकि आम जनता कागजी प्रक्रियाओं और नोटिसों के मकड़जाल में उलझने के लिए विवश है।
2. प्रशासनिक विफलता और सांख्यिकीय विसंगतियाँ: एसआईआर (SIR) का संकट
दिल्ली में एसआईआर के तहत ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होने के दौरान लगभग "47 लाख से अधिक नाम" हटाए जाने की घटना और उसके उपरांत "33 लाख से अधिक लोगों को नोटिस जारी किया जाना" प्रशासनिक अव्यवस्था का भयंकर उदाहरण है।
प्रशासनिक शिथिलता का पैमाना: जिन लोगों को नोटिस थमाए गए हैं, उनमें केवल आम नागरिक ही नहीं, बल्कि देश के शीर्षस्थ मौजूदा और सेवानिवृत्त नौकरशाह, यहाँ तक कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, विदेश मंत्री एस जयशंकर, सेबी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार जैसे विशिष्ट नाम शामिल हैं।
ऐतिहासिक विसंगतियाँ: यहाँ तक कि पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और वर्ष 2024 में दिवंगत हो चुके प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य बिबेक देबरॉय के नाम भी नोटिस जारी होना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से बिना सोचे-समझे, यांत्रिक और सतही ढंग से चलाई गई है।
3. लोकतंत्र, जनहित और राष्ट्रहित पर मंडराता खतरा
जब लाखों सामान्य नागरिकों को बिना ठोस और पारदर्शी आधार के मतदाता सूची से बाहर का रास्ता दिखाया जाता है, तो यह सीधे तौर पर "जनहित और राष्ट्रहित" पर कुठाराघात है।
दोहरे मापदंड: जब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नाम पर नोटिस आने पर चुनाव आयोग ने त्वरित संज्ञान लेते हुए घंटों के भीतर उनका नाम सूची में सुधार कर जोड़ा, तब यह गंभीर सवाल खड़ा हुआ कि क्या यही तत्परता उन लाखों गरीब, वंचित और श्रमिक वर्ग के नागरिकों के लिए दिखाई जाएगी, जो बीएलओ (BLO) के कार्यालयों के चक्कर काटने के लिए मजबूर हैं?
वंचितों का मताधिकार हनन: गरीब बस्तियों और कमजोर तबकों के पास न तो प्रशासनिक पहुंच होती है और न ही वे दफ्तरों के चक्कर काटने का सामर्थ्य रखते हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर नाम काटना वस्तुतः उन्हें चुनावी प्रक्रिया से बेदखल करने का एक मौन षड्यंत्र प्रतीत होता है।
4. मीडिया की चुप्पी: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहाँ है?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे डरावना पहलू यह है कि देश का मुख्यधारा का मीडिया इस गंभीर लोकतांत्रिक संकट पर लगभग "मौन" है।
चर्चाओं से गायब मुद्दे: जहाँ एक ओर मामूली राजनीतिक बयानों और सनसनीखेज विषयों पर घंटों बहसें होती हैं, वहीं सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार जैसे पवित्र अधिकार के संभावित पतन और लाखों नागरिकों के मताधिकार छिनने की आशंका पर पर्दा डाल दिया गया है।
जवाबदेही का संकट: जब मीडिया ही सत्ता और निर्वाचन निकायों के समक्ष सवाल खड़े करना बंद कर दे, तो लोकतंत्र 'निर्वाचन तंत्र' से सिमटकर एक दिखावा मात्र रह जाता है। मीडिया की यह चुप्पी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के अपने कर्तव्यों से विमुख होने का स्पष्ट संकेत है।
आज भारतीय लोकतंत्र एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ संविधान की गरिमा है और दूसरी तरफ प्रशासनिक मनमानी और संस्थागत उदासीनता। यदि इस समय नागरिक समाज, न्यायपालिका और जागरूक जनमानस ने इस प्रवृत्ति पर सवाल नहीं उठाए, तो वह दिन दूर नहीं जब सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार केवल किताबों के पन्नों तक सिमट कर रह जाएगा।
यह समय केवल कागजी नोटिसों का जवाब देने का नहीं, बल्कि व्यवस्था से यह पूछने का है कि क्या इस देश में नागरिक की पहचान उसकी नागरिकता से तय होगी या उसके 'वीआईपी' होने के दर्जे से?
